Saturday, November 21, 2009

क्यों हर रोज शाम हो जाती है

क्यों हर रोज शाम हो जाती है.

कितनी मेहनत कर हर मौसम में
जाग ही जाता है कैसे भी क्यों न हो
धरती का भाग्य !
और हम इंतजार करते हैं
उस पल का जब आएगी हमारी बारी
पर
आः!
इंतजार में ही जिंदगी
तमाम हो जाती है.

क्यों हर रोज शाम हो जाती है.

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Wednesday, July 8, 2009

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Thursday, June 18, 2009

हरियाली तीज

हरित वर्ण साटिका-पर्ण में, लिपटा हुआ गुलाब ।
भरा-भरा सा वदन तुम्हारा, बिल्कुल लाजबाब ॥

हरियाले सावन का रंग, कंगन की हरियाली ।
खग की चहक खनक में इसकी, मस्तानी- मतवाली ॥

हरे रंग का टीका, चेहरे पर खूब सजा है ।
कर रहा इशारे में प्रेम की, दिल से आज रज़ा है ॥

ऊपर से नीचे तक तुम पर, हरे रंग का राज।
इस हरियाली में खो जाए ,मेरा रंग भी आज॥
( साटिका = साड़ी)
गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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Monday, May 25, 2009

अदम

इतना मैं घर में तुम्हारे अहम हूँ ।
ये तो नहीं की शिकार-ऐ-वहम हूँ ।
जब भी सुना बस मेरा जिक्र था ।
जिक्र ही से बन गया मैं अदम हूँ ।
ओ! मेरे मिलते ही खुश होने वाले ।
(क्या) मिलके भी अब मैं करता सितम हूँ।
नज़र अब भी तलाशती तेरी किसको।
जुल्म सहने को क्या मैं एक कम हूँ।
उठाई जो नज़रें चलाये हैं खंज़र ।
'हिंदुस्तान' मैं तो हुआ यूँ कलम हूँ।

(अदम=जो नहीं था)

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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Saturday, April 11, 2009

ये मेरे बस की बात नहीं .

दिन को दिन ही कह पाऊँगा, कह सकता दिन को रात नहीं।
मुँह देखी प्रीत निभा पाऊँ , ये मेरे बस की बात नहीं ।

कह लो मुँहफट भले मुझे , या नाम कोई मुझ को दे लो।
मुँह से जहर उगलने का , इल्जाम भले मुझ को दे लो।
मैं भी नहीं धुला ढूध का , कह कर ये संतोष करो।
या फिर कह लो, तुम्हें समझ लूँ, मेरी इतनी औकात नहीं ।
मुँह देखी प्रीत निभा पाऊँ ये मेरे बस की बात नहीं ।

जब भी मिलते हैं हम -तुम , एक अजीब दंभ से भरे हुए।
झुकना पड़ गया कहीं अगर , अपमान- भीती से डरे हुए।
आँख -मिचौली की क्रीडा , बस पीड़ा पर जाकर ठहरेगी।
हार किसी एक की, क्या होगी दुजे की भी मात नहीं।
मुँह देखी प्रीत निभा पाऊँ, ये मेरे बस की बात नहीं।

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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Friday, March 27, 2009

अक्कू-निक्कू

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Saturday, March 21, 2009

SHRI VISHNU SAHSTRANAAM

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Saturday, March 14, 2009

अब कुछ भी हो जाने दो

अब कुछ भी हो जाने दो
जब तुमने सच्चा मान लिया अब कुछ भी हो जाने दो.
मुझको मंजिल सूझ गई , अब मंजिल को पाने दो .

बहुत बार मैं ठहर गया था ,डर से घोर अँधेरे के .
कितनी बार छल गए मुझे खाली हाथ सपेरे के .
आज बीन छीन ली मैनें , मुझको सांप नचाने दो.
मुझको मंजिल सूझ गई , अब मंजिल को पाने दो .

जब से तुने मुझे सराहा मैं कितना बदल गया हूँ.
गिरता पड़ता रहता था बिलकुल संभल गया हूँ.
निभ न सके थे जो वादे , वो वादे मुझे निभाने दो.
मुझको मंजिल सूझ गई , अब मंजिल को पाने दो .

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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Monday, March 2, 2009

बस देखना है

थोडी देर की है बात
आएगी फ़िर हाथ
पकडूँगा मैं उसको
करूंगा मन की ॥

भागती फिरती थी आज तलक जो
देखना कैसे ठहरती है वो
रोक कर उसको दिखलाऊंगा मैं
हिरनी थी जो ऊँचे नील गगन की

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Friday, February 27, 2009

स्वप्नावस्था

भी-अभी ही स्मृति में आया, तव सुंदर रूप सलौना
नीले नयन चपल मृदु चितवन ,अति चंचल सा मृगछौना.
ताराओं के मध्य गगन में ,चंद्र चमकता पूनम का
मलतास पर यौवन आया, मादक मधु के मौसम का
नीरद बोला," देख उसे ",चिर-संगी चपला प्रीता से
ताजमहल भी सुन्दरता में , बढ़कर नहीं अनीता से

चपला=बादल में बसने वाली बिजली

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कंज लोचन

न्कित चित्र पटल पर सुंदर नयन तुम्हारे
नीलवर्ण-रक्ताभ निगाहें जाने किसे निहारें
ता भरे जल के भीतर जैसे युगल कमल हो
अली उतर अतल में खोया , आकर कौन उबारे

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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अनीता

नीता
ब याद का दामन जो संभाला मैनें.
नीम बेहोशियो से खुद को निकला मैंने .
तारीकियों में उम्र बसर कर दी .
तुमको देखा तो देखा है उजाला मैंने .

न्दाज नया जीने का है मिला मुझको .
नीची नजरों से मगर एक गिला मुझको.
तारीफ में इनकी एक कशीदा जो कहा .
पलकें जरा उठा के क्या दिया पिला मुझको .

य्याम-ऐ-गुल -ओ-नज्जारगी-ऐ-खूबरू .
नी में इस अर्श की रुख-ऐ-रोशन-सुर्खरू.
ताब-ऐ-जुल्फ-ऐ-पुर-शिकन के साथ ही.
पिन्हाँ है दिल में अंदाज-ऐ-गुल-अफ्शानी--ऐ-गुफ्तगू .

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Thursday, February 19, 2009

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Sunday, February 15, 2009

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Tuesday, September 9, 2008

poems will be there on this page by next month



You and me are coming on a juncture where our thoughts are not only ours but it is of the whole world.
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POEM SECTION

after some time you will read here my poems.

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